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इमाम ज़माना की शख़सी ज़िन्दगी

हमारे बुजुर्ग उलमा व मुफ़क्किरों ने हजरत इमाम महदी (अ.) की जिन्दगी के बारे में बहुत अहम किताबें लिखी हैं और इस मौज़ू पर मुख्तलिफ़ तरीकों से बहस की है। मगर अब भी कुछ बातें और कुछ पहलू अछूते रह गये हैं। मसलन हज़रत बक़िय्यतुल्लाह की शख़्सी ज़िन्दगी कहां और कैसे बसर होती है ? ताज्जुब की बात यह है कि अभी तक इस मस्अले पर तहक़ीक़ भी नही हुई है। लिहाज़ा यह किताब भी इसका पूरा जवाब नही दे पायेगी। मगर उम्मीद है कि आने वाले मुहक़्क़ेक़ीन अपनी नजरे अमीक़ व तहक़ीक़ दक़ीक़ से इस मस्अले के हर रुख से पर्दा उठा कर बहुतसी किताबें लिखेंगे।

 अभी तक इस मौज़ू पर ग़ौर करने वाले जिस नतीजे पर पहुँचे हैं, खुसूसन वह ख़ुश किस्मत हज़रात जो इमाम अलैहिस्सलाम या उनकी मुक़द्दस व पुर नूर क़ियामगाह की ज़ियारत से मुशर्रफ हुए हैं, इस बात के मोतक़िद हैं कि बहरे एटलस में तीन जज़ीरे दुशमनों की दस्तरस से बहुत दूर इस मेहरे ताबां की ज़ाहिरी क़ियामगाह का मरकज़ हैं। जिनमें से एक में आप की खुसूसी क़ियामगाह है और दूसरा आप की औलादे आली मक़ाम के क़ियाम का जज़ीरा है और तीसरा जज़ीरा खेती बाड़ी और खाने पीने की चीज़े पैदा करने के लिए मख़सूस है और यह तमाम जज़ीरों के बाशिन्दों की ज़रूरियात को पूरा करता है।

बयान करते हैं कि हज़रत के जज़ीरे तक जाने के लिए आपकी औलाद में से भी किसी को इजाज़त नही है। अलबत्ता आप के पास दस औताद या उससे कम रहते हैं जो आप की ख़िदमत गुज़ारी करते हैं। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने उनके औताद की तादाद तीस बयान फ़रमाई है।

अल्लामा मजलिसी बयान फरमाते हैं कि यह रिवायत दलालत करती है कि हमेशा शियों में से तीस इंसान आप के पास रहते हैं, जब उनमे से किसी की मौत हो जाती है तो दूसरा उसकी जगह परपहुँच जाता है।

 मरह़ूम मिर्ज़ा नूरी भी यही फरमाते हैं कि अगर यह तीस शिया उम्रे तूलानी नही रखते तो हर क़र्न (सदी) में तबदील होते रहते हैं। मगर 30 परहेज़गार मोमिन (औताद व औलिया) हर हाल में आप की ख़िदमत का शरफ़ ह़ासिल करते हैं।

 इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम इरशाद फरमाते हैं कि ग़ैबत कुबरा के ज़माने में ख़ास शिया के अलावा किसी को भी इमाम  अलैहिस्सलाम की क़ियामगाह के बारे में खबर नही है। दूसरी हदीस में फ़रमाते हैं कि इमामे ज़माना की क़ियामगाह का सिर्फ उन लोगों को इल्म हैं जो आप की ख़िदमत अंजाम देते हैं। बहर हाल यह तै है कि ग़ैबते कुबरा के ज़माने में आप तन्हा नही हैं बल्कि औताद का एक गिरोह आपकी ख़िदमत गुज़ारी के लिए हर वक्त मौजूद रहता हैं।

 ग़ैबते कुबरा के ज़माने में हज़रत बक़िय्यतुल्लाह ज़ौजः व औलाद रखते हैं या नही ? इस सिलसिले में कोई क़त्ई दलील न होने की बिना पर हम कुछ भी यकीन के साथ नही कह सकते। मगर कुछ क़राइन ऐसे ज़रूर हैं जिनसे आप की औलाद व ज़ौजह के वजूद के बारे में एहसास होता है। वह क़राइन यह हैं।

(1)               क़ाएद ए- कुल्ली

(2)               रिवायात

(3)               दुआऐं

(1)               क़ाएद ए- कुल्ली

शरीअते मोहम्मदी (स.अ.) के अहकाम कुल्ली के एतेबार से दूसरे मासूम इमामों की तरह हज़रत हुज्जत अलैहिस्सलाम के लिए भी ज़रूरी है कि आप भी घर बसायें और अपने जद्दे बुज़ुर्गवार पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की सुन्नते निकाह पर अमल करें और रोहबानियत (संयासी) की ज़िन्दगी से दूर रहें । इस लिए मानना पड़ता है कि इस इस लम्बी ज़िंदगी में आप भी बीवी बच्चों वाले होंगे। बल्कि इतनी लम्बी उम्र का तक़ाज़ा तो यह है कि आपकी औलाद भी काफ़ी ज़्यादह हो।

(2)               रिवायात

मरह़ूम कफ़अमी ने मिस्बाह में नक़्ल फ़रमाया है कि हज़रत बक़िय्यतुल्लाह (अज्ज ) की बीवी ....... की नस्ल से हैं औलाद के बारे में भी दूसरी रिवायतें मौजूद हैं मसलन

(अ)             जनाब सैयद बिन ताऊस ने किताह जमालुल उसबूअ में फरमाया है कि मैंने एक रिवायत मुत्तसिल सनदों के साथ देखी है जिस में तहरीर है कि हज़रत वली ए अस्र के काफ़ी औलाद है जो दरियाओं के किनारे आबाद हैं और वहाँ के हाकिम भी वही हैं। अपने किरदार व अफ़आल के एतेबार से सब औलाद नेक हैं।

(आ)           हज़रत इमाम सादिक़ अलै हिस्सलाम फ़रमाते हैं कि साह़िबे अम्र के लिए दो ग़ैबतें हैं, जिनमें से एक ग़ैबत इस क़द्र तूलानी होगी कि बाज़ लोग कहेंगे कि वह आये थे और चले गये सिर्फ शियों की क़लील तादाद ही अपने ईमान पर बाक़ी रहेगी। आपकी क़ियामगाह से कोई वाक़िफ न होगा ह़त्ता कि औलाद भी, मगर वह हज़रात जो ख़िदमत पर मामूर हैं वाक़िफ होंगे।

(इ)               मुहम्मद मशहदी किताब मज़ार में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से नक्ल करते हैं कि आप ने फ़रमाया गोया मैं मस्जिद सहला में क़ाइम (अज्ज) के नूज़ूल को मअ अहलो अयाल देख रहा हूँ।

(ई)               रिवायते अम्बार दर रिवायते अली बिन फ़ाज़िल भी आप की औलाद के वजूद पर दलील है जो आप इसी किताब में मुलाह़ेजा फ़रमायेंगे।

(उ)               इसके अलावा शेख़ हुर्रे आमुली ने किताब अल ईक़ाज़ मिनल हिजा में हज़रत हुज्जत की औलाद की हुकूमत का ज़िक्र किया है .

मरह़ूम अल्लामा मजलिसी ने अपनी किताब में एक बाब हज़रत इमाम महदी की औलाद व ख़ुलफ़ा से मुख़तस तहरीर किया है।

इस लिए इन बयानात व रिवायात से यही समझ में आता है कि हज़रत इमाम महदी (अज्ज) के काफी औलाद हैं जो औलिया व सुलहा व शुरफा में शुमार होते हैं लेकिन इन में से कोई इमाम नही है। बल्कि इमामत सिर्फ बारह इमामों में मुन्हसिर है।

(3)               दुआऐं

अक्सर दुआऐं जो आइम्मा ए- मासूम से मरवी हैं या खुद हज़रत ह़ुज्जत की जानिब से पहुँची हैं और आज ग़ैबते कुबरा के ज़माने में मुतबर्रिक दिनों में मुक़द्दस मक़ामात पर पढ़ी जाती हैं। उनमें ह़ज़रत की औलाद का ज़िक्र आया है और उनके हक़ में दुआ भी की है इस लिए औलादे ह़ज़रते महदी के वजूद पर यह वाज़ेह दलील है। इन दुआओं में लफ़्ज़े वलद ,ज़ुर्रियत, अहलेबैत व आले बैत ,, इस्तेमाल हुए हैं।

ऐसी दुआऐं बहुतसी मशहूर किताबों में मौजूद हैं जैसे ग़ैबते शैख़ तूसी, मिस्बाहे कफ़अमी, बिहारुल अनवार वग़ैरह।

इन दुआओं से भी यही नतीजा निकलता है कि ग़ैबत के ज़माने में ह़ज़रत बक़िय्यतुल्लाह के औलाद हैं जो नेक व परहेज़गार हैं । आपके ज़ोहूर के वक़्त यह आप के पास मौजूद होंगे और आपके बाद आपके हिदायत के काम को मुकम्मल फ़रमायेंगे। अलबत्ता इन तमाम रिवायतों से ज़हन में यह सवाल पैदा होता है कि यह तमाम औलाद कहाँ ज़िन्दगी बसर कर रही है ? क्या वह सब भी हमारी नज़रों से पोशीदा ज़िन्दगी बसर करते हैं या हमारे दरमियान इन्सानी सूरत में रहते हैं, मगर पहचाने नही जाते ? हम पिछले पेज पर लिख चुके हैं कि ह़ज़रत ह़ुज्जत अलैहिस्सलाम इस दौर में तन्हा नही रहते हैं, बल्कि हमेशा औताद व ख़िदमत गुज़ारों का एक गिरोह आपके पास मौजूद रहता है, जिनके अलावा कोई आपकी क़यामगाह से वाक़िफ़ नही है।

 

दास्ताने जज़ीरा ए- ख़ज़रा इन तमाम कैफ़ियात की अक्कासी के लिए बेहतरीन व मोतबर दास्तान है। जिससे हज़रत की क़ियामगाह, औलाद और उनकी हुकूमत व तर्ज़े ज़िन्दगी वग़ैरह पर काफ़ी रौशनी पड़ती है। इससे यह भी यक़ीन होता है कि अगर इमाम की मसलेहत हो तो यह जगह ख़ास लोगों को दिखाई भी जा सकती है। जैसा कि अली इब्ने फ़ाज़िल माज़न्दरानी मुत्तक़ी रोज़गार को तलब किया गया और मेहमान रखा गया ताकि मुस्तक़बिल में दलील बाक़ी रह सके और मोमनीन व ख़ालिस शिया हमेशा इस जानिब मुतवज्जेह रहें।

 चूँकि हमारी इस किताब का मक़सद ही ह़ज़रत बक़िय्यतुल्लाह (अ.) की क़ियामगाह का तअर्रुफ़ (परिचय) है इस लिए हम इस मौज़ूअ को ज़रा तफ़सील से ब्यान करेंगे ।