रिसाल – ए- ज़ज़ीर – ए- ख़िजरा के सफ़ा 16 में अहादीसे आले मुहम्मद
अलैहिमु अस्सलाम के हवाले से लिखा है कि हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम से हर मोमिन
की मुलाक़ात होती है। यह और बात है कि मोमेनीन उन्हें मसलहते ख़ुदा की बिना पर न
पहचान सकें जिस तरह पहचानना चाहिये। मुनासिब है कि इस मक़ाम पर मैं अपना एक ख़्वाब
लिख दूँ। वाक़िया यह है कि आज कल जब कि मैं इमामे ज़माना के हालात लिख रहा हूँ,
हदीसे मज़कूर पर नज़र डालने के बाद फौरन ज़हन में यह ख़्याल पैदा हुआ कि मौला सबको
दिखाई देते हैं लेकिन मुझे आज तक नज़र नहीं आये। इसके बाद मैं बिसतरे पर गया और
सोने के इरादे से लेटा। अभी नींद न आई थी और कतई तौर पर नीम बेदारी (ग़ुनूदगी) की
हालत थी कि नागाह मैंने देखा कि मेरे मकान से मशरिक़ की जानिब ता बा हद्दे नज़र एक
क़ौसी ख़त पड़ा हुआ है यानी शुमाल की जानिब का सारा हिस्सा पहाड़ है और उस पर इमाम
महदी अलैहिस्सलाम तलवार लिये खड़े हैं और यह कह कर कि “ निसफ़ दुनिया आज ही
फ़तह कर लूँगा ” शुमाल की तरफ़ एक
पाँव बढा रहे हैं। आपका क़द आम इमामों के क़द से डयोढ़ा और जिस्म दोहरा है। बड़ी
बड़ी सुरमगीं आख़ें और चेहरा इन्तेहाई रौशन है। आपके पट्टे कटे हुये हैं और सारा
लिबास सफ़ैद है और वक़्त अस्र का है। यह वाक़िया 30 नव्मबर 1958 ई0 शबे यकुम शाबान
ब वक़्त 4:30 बजे शब का है।