ह़ज़रत हुज्जत
अलैहिस्सलाम की क़ियामगाह के बारे में जो क़ौल मुसल्लम व ना क़ाबिले तरदीद है वह यह
है कि आप हर साल ह़ज के मौसम में ख़ाना – ए- ख़ुदा की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ लाते हैं और
ह़ज के आमाल में शिरकत करते हैं। मगर हाजियों की भीड़ उन्हें देखे नही पाती या वह
दिखई तो देते हैं मगर पहचाने नही जाते। हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम की ग़ैबत के
ज़माने में उनके सच्चे दोस्त व चाहने वाले जब हज्जे ख़ाना ए ख़ुदा के लिए जाते हैं
तो हज के आमाल के दौरान उनके नक़्शे क़दम की तलाश में मशग़ूल रहते हैं। किस क़द्र
ख़ुश क़िस्मत हैं वह लोग जो इस काबा ए मक़सूद की ज़ियारत से ख़ाना ए ख़ुदा की
ज़ियारत में मशग़ूल हो जाए जैसा कि अक्सर मुशर्रफ़ हुए भी हैं। लेकिन मौसमे हज के
अलावा कोई पक्की दलील हम उनके क़ियाम के बारे में हमारे पास नही है। हम किसी मकान
को उनके लिए मुऐय्यन भी नही कर सकते हैं। कुछ हदीसों में इस बारे में फ़क़त इशारे
ही मिलते हैं जिनमें से कुछ को हम यहाँ लिख रहे हैं।
(1) सर ज़मीने दूर दस्त
तौक़ी ए शरीफ़ में
जो सन 40 हिजरी में नाहिया ए मुक़द्दस से यानी इमाम के पास से शैख़ मुफ़ीद के
इफ़तेख़ार के सिलसिले में सादिर हुई है उसमें हज़रत हुज्जत अलैहिस्सलाम के ख़त में
तहरीर है कि
अगरचे हम ने दूर
दराज़ की सर ज़मीन में क़ियाम अख़तियार कर लिया है और हम सितमगरों की सर ज़मीन से
दूर हैं। क्योंकि ख़ुदा वन्दे आलम ने हमारे और हमारे शिया मामिनों के सिलसिले में
यही मसलेहत अख़तियार की है कि जब तक दुनिया की हुकूमत तबाह व बर्बाद करने वाले
ज़ालिमों के हाथ में है, उस वक़्त तक हम इसी दूर दस्त मक़ाम पर क़ियाम करें। मगर हम
तुम्हारी ख़बरों से आगाह हैं और तुम्हारी कोई भी बात हमसे पोशीदा नही है। हम जानते
हैं कि तुम पर क्या मुसीबतें व परेशानियाँ गुज़र रही है। यह उस वक़्त से है जबसे
तुम में से बहुत से शियों ने ऐसे काम करने शुरु कर दिये जिन से तुम्हारे नेक अफ़राद
दूर रहा करते थे और वह अह्द जो ख़ुदा ने तुम से लिया था उसको इस तरह पसे पुशत डाल
दिया है जैसे कि उसकी तुम्हें कोई ख़बर ही न हो। इस के बावजूद हमने तुम्हें तर्क
नही किया और तुम्हारी याद को अपने दिल से नही निकाला है। अगर हम अपनी तवज्जोह
तुम्हारी तरफ़ से हटा लेते तो तुम्हे बहुत सी मुसीबतें घेर लेतीं और तुम्हारे दुशमन
तुम को और तुम्हारी बुनियादों को मिटा देते और तुम्हारे वजूद का क़ला क़मा कर देते।
(2) मदीना ए तैयेबः
हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम से मालूम किया गया कि
अगर कोई हादसा पेश आ जाये तो हम आपके फ़रज़न्दे बुज़ुर्गवार को कहाँ तलाश करें
? तो आप
ने फ़रमाया मदीने में।
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने जब अपने फ़रज़न्द की
गैबत के बारे में गुफ़्तुगु की तो इरशाद फ़रमाया, मदीना कितनी अचछी जगह है !
(3) दश्ते हिजाज़
इब्राहीम बिन महज़ियार जिनको हज़रत की ज़ियारत का शरफ़
नसीब हुआ है, वह बयान करते हैं कि ताइफ़ से गुज़रते हुए दश्ते हिजाज़ में जिसको
अवाली भी कहते हैं, मुझे हिदायत हुई कि यहाँ काबा ए मक़सूद हासिल होगा। चुनान्चे इस
दीदार में इमाम अलैहिस्सलाम ने मुझ से फ़रमाया कि मेरे वालिदे बुज़ुर्दवार ने मुझ
से अह्द लिया है कि मैं पोशीदा तरीन और दूर तरीन ज़मीन में क़ियाम करुँ, ताकि अहले
ज़लालत के शर से अमान में रहूँ। इस अह्द ने मुझे रेगज़ारे अवाली (दशते हिजाज़ अज़
नज्द ता तहामा ) में डाल दिया है।
(4) कोहे रिज़वी
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने कोहे रिज़वी के बारे में
बहस की और आख़िर में फ़रमाया कि वहाँ हर दरख़्त का मेवा मौजूद है और वह क्या
बेहतरीन पनाह गाह है ख़ौफ़ ज़दः आदमी के लिए और वह क्या अच्छी पनाह गाह है साहेबुल
अम्र के लिए जिसकी दो ग़ैबतें हैं, एक कोताह (सुग़रा) दूसरी तूलानी (कुबरा)।
(5) कुरा
अल्लामा मजलिसी मरहूम ने तज़किरा तुल आइम्मा में अहले
सुन्नत का किताब से नक्ल किया है कि हज़रत महदी अलैहिस्सलाम गैबते कुबरा के ज़माने
में एक क़रिये में क़याम करेंगे जिस का नाम (कुरा) है।
(6) जाबलक़ा व जाबलसा
मरहूम मिर्ज़ा नूरी इरशाद फ़रमाते हैं कि ऐसी बहुत सी
ख़बरें मौजूद हैं जो मअना के एतेबार से मोतावातिर दलालत करती हैं कि मशरिक़ व मगरिब
में दो शहर बनामे जाबलक़ा व जाबलसा मौजूद हैं। वहाँ के बाशिन्दे हज़रत वली ए अस्र
के अन्सार हैं, जो हज़रत के साथ ख़ुरुज करेंगे। मुहक़्क़ेकीन अभी तक मुकम्मल तौर से
इन दो नामों की हक़ीक़त तक नही पहुँच सके। अलबत्ता पुराने उलमा सिर्फ़ इस बात पर
मुत्तफ़िक़ हैं कि जाबलसा दुनिया के इन्तेहाई मग़रेबी हिस्से का शहर है और जाबलक़ा
दुनिया के इन्तेहाई मशरिक़ी हिस्से का शहर है। इन दोनों शहरों का नाम इमाम हसन
मुज्तबा अलैहिस्सलाम ने अपने ख़ुत्बे में मुआविया के सामने ख़िताब फ़रमाते हुए लिया
है। इस ख़ुत्बे में आप ने फ़रमाया था कि अगर तुम जाबलक़ा व जाबलसा के दरमियान गरदिश
करो और ऐसा इन्सान तलाश करो कि जिस के दादा रसूले अकरम (सल्लल्लाहु अलैह व आलाहि
वसल्लम) हों तो सिवाये मेरे और मेरे भाई हुसैन के पैदा न कर सकोगे।
(7) बलदे महदी
अल्लामा मजलिसी बिहारुल अनवार की जिल्द (अस्समा वल आलम)
में अहले सुन्नत की किताब के हवाले से तहरीर फ़रमाते हैं कि बलदे महदी एक शहर है
जिसको ख़ुश नुमा व मुस्तहकम बनाया है महदी फ़ात्मी ने और यह उनके लिए क़िला है।
(8) बैतुल हम्द
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इरशाद फ़रमाया कि
साहिबे अम्र के लिए एक घर है जिसको बैतुल हम्द कहा जाता है। उस घर में एक चिराग़ है
जो आप की विलादत के दिन से रौशन है यह चिराग़ उस वक़्त तक ख़ामोश न होगा जब तक आप
शमशीर के साथ क़ियाम न फ़रमायेंगे।
(9) जज़ाएरे मुबारेका
एक मुफ़स्सल दास्तान है कि एक मोहतरम शख़्स ने
औनुद्दीन नज़ीर की मजलिस में इज़हार किया कि मैं साल 522 हिजरी में अपने बीवी
बच्चों के साथ एक बरबर नामी तिजारती सर ज़मीन पर गया और वहाँ से हमने दरियाई सफ़र
शूरु किया। चलते चलते हम एक ऐसे जज़ीरे में पहुँचे जिसको किश्ती के ना ख़ुदा
(मल्लाह) ने भी पहली बार ही देखा था। जब हमने वहाँ के बारे में मालूमात की तो पता
चला कि वहाँ पाँच जज़ीरे हैं। जिनके नाम यह है,
1) मुबारेका
2) ज़ाहेरा
3) साफ़िया
4) ज़लूम
5) अनातीस
इन जज़ीरे के तमाम बाशिन्दे मुसलमान और शिया हैं और इन
जज़ीरों पर हज़रत हुज्जत की औलाद से पाँच अफ़राद हुकूमत करते हैं। जिन के नाम इस
तरह हैं--
1)
ताहिर पिसरे
हज़रत साहेबुल अम्र (अज्ज)
2)
क़ासिम
पिसरे साहेबुल अम्र (अज्ज)
3)
इब्राहीम
पिसरे साहेबुल अम्र (अज्ज)
4)
अबदुर्रहमान
पिसरे साहेबुल अम्र (अज्ज)
5)
हाशिम पिसरे
साहेबुल अम्र (अज्ज)
इस के बाद ब्यान करने वाले ने ख़ुद को तो मसीही बताया
मगर मज़कूरः हज़रात के अख़लाक़ व नेक रफ़्तारी की बेहद तारीफ़ की और वहाँ की बे
नज़ीर सफ़ाई व ज़ेबाई का तज़केरः किया। जब बात चीत तमाम हुई तो उस वज़ीरे नास्बी व
वहाबी मनिश ने उस मजलिस में मौजूद अफ़राद से अह्द लिया कि आज के बाद यह दास्तान
हरगिज़ किसी से ब्यान न करे।
यह दास्तान बहुत सी किताबों में नक़्ल हुई है मसलनः
(1) अस्सिरातुल मुस्तक़ीम,
ज़ैनुद्दीन अली इब्ने यूनुस आमुली
(2) अस्सुल्तानुल मोफ़र्रज अन अहलिल
ईमान, तालीफ़ अली इब्ने अब्दुल हमीद नीली
(7) अल अबक़री-यिल हिसान, तालीफ़
शेख़ अली अकबर निहा वन्दी (जिल्द 2 सफ़हा 123 से 126 तक) इस दास्तान के ख़ुलासे को
साहिबे वसाइल मरहूम ने किताब इस्बातुल हुदात में भी नक़्ल किया है।
(जिल्द3सफ़हा479)
(10) जज़ीर ए ख़ज़रा
जज़ीर ए ख़ज़रा की तफ़्सीली दास्तान हम अगले
पेजों पर लिखेंगे। यहाँ तो सिर्फ़ हवाले के तौर पर नक़्ल करते हैं कि ज़ैनुद्दीन
अली इब्ने फ़ाज़िल माज़न्दरानी ने साल 690 में बहरे एटलस का सफ़र किया। वह बरबर की
सर ज़मीन से तीन दिन मुसलसल किश्ती का सफ़र करते हुए समुन्द्र के दरमियान
राफ़ज़ियों के जज़ीरे (शियों के जज़ीरे) में पहुँच गये। वहाँ उन्हें पता चला कि
यहाँ एक ख़ज़रा नाम का जज़ीरः भी है, जिसमें हज़रत हुज्जत की औलाद ज़िन्दगी बसर
करती है। उन्होंने वहाँ चालीस रोज़ क़ियाम किया चालीस दिन के बाद सात किश्तियाँ
खाने पीने के सामानों से भरी हुई जज़ीरा ए ख़ज़रा से उस जज़ीरे में आईं तो किश्ती
के नाख़ुदा ने ज़ैनुद्दीन का नाम उनके वालिद के नाम के साथ बलन्द आवाज़ में लिया और
कहा मुझे तुम्हारे बारे में हिदायात दी गयी हैं कि तुम को लेकर जज़ीर ए ख़ज़रा पर
पहुँचूं।
चूनान्चे किश्ती वाले उस को जज़ीर ए ख़ज़रा ले
गये। सोलह दिन के दरियाई सफ़र के बाद जब (सफ़ेद पानी पर पहुँचे) तो उस नाख़ुदा ने
बताया कि इस पानी ने मिस्ले सूरूल बलद जज़ीरे का इस तरह इहाता (घेराव) कर रखा है कि
दुश्मनों की कोई किश्ती हरगिज़ इस पाने से नही गुज़र सकती। अगर कोई कोशिश करेगी तो
हज़रत वली ए अस्र की बरकत से इसी पानी में ग़र्क़ हो जायेगी।
जब यह जज़ीर – ए- ख़ज़रा में पहुँचे तो वहाँ बहुत ज़्यादा
लोगों को देखा, जो बेहतरीन लिबास पहने हुए थे। शहर बेहद आबाद था, चारों तरफ़ सर
सब्ज़ दरख़्त और तरह रतह के फल मौजूद थे। मकान साफ व शफ़्फ़ाफ़ आलीशान पत्थर के बने
हुए थे और बाज़ारों में रौनक़ थी।
यहाँ एक शख़्से बुज़ुर्गवार बनामे सैयद
शम्सुद्दीन थे जो हज़रत हुज्जत की पाँचवी पुश्त में बताए जाते थे। आप हज़रत की तरफ़
से नाइबे ख़ास के मनसब पर फ़ाइज़ और तालीम व तरबीयत के कुल्ली तौर पर ज़िम्मेदार
थे। आप के पास मुस्तक़ीमन हज़रत वली ए अस्र के फ़रमान पहुँचते रहते थे। यहाँ हज़रते
हुज्जत ख़ुद नज़र नही आते थे बल्कि जुमे की हर सुबह को एक ख़त इमाम अलैहिस्सलाम का
एक मुऐय्यन मक़ाम पर मिल जाता था। इस में शम्सुद्दीन साहब के बारे में एक हफ़्ते का
प्रोग्राम लिखा होता था।
अली इब्ने फ़ाज़िल ने वहाँ 18 दिन क़ियाम किया
और जनाब सैयद शम्सुद्दीन साहब के पुर फ़ैज़ वजूद से फ़ैज़याब होते रहे। 18 दिन के
बाद उनको हुक्म हुआ कि अब अपने वतन वापस चले जायें। अली इब्ने फ़ाज़िल ने जनाब
शम्सुद्दीन साहब के वजूद से जो कुछ फ़ैज़ हासिल किया था, उन्होंने उसको अल फ़वाएदुश
शम्सिया नामी किताब में जमा कर दिया है। इस किताब में उन्होंने अपनी मुलाकात की
कैफ़ीयत वज़ाहत के साथ अपने ज़माने के चन्द उलमा से बयान की है।
फ़ज़्ल इब्ने याह़िया तैयबी सातवीं सदी के
मशहूर मुसन्निफ़ (राइटर) ने 2 शव्वाल को हिल्ला में अली इब्ने फ़ाज़िल की ज़बान से
इस दास्तान को तफ़्सील के साथ सुना और उसको एक अल जज़ीरतुल ख़ज़रा नामी किताब में
लिख दिया। यह किताब शुरू से ही उलमा ए शिया की तवज्जोह का मरकज़ रही है लिहाज़ा ---
(1)
शहीदे अव्वल
ने इस को अपने ख़त में तहरीर किया। उनकी यह तहरीर अमीरुल मोमनीन के ख़ज़ाने में
पाई गई।
(2)
मुहक़्क़िक़
करकी ने इस दास्तान का फ़ारसी में तर्जुमा किया।
(3)
अल्लामा
मजलिसी ने इस को बिहारुल अनवार में दर्ज किया।
(4)
मुक़द्दस
अरदबेली ने इस को हदी-क़तुश् शिया में लिखा।
(5)
शेख़ हुर्रे
आमुली ने इस को इस्बातुल होदात में दर्ज फ़रमाया।
(6)
वहीद
बहबहानी ने इस दास्तान के मज़मून पर फ़तवा दिया।
(7)
बहरुल उलूम
ने अपनी किताब रिजाल में इस की सनद बयान की।
(8)
क़ाज़ी
नूरुल्लाह शूस्तरी ने हर मोमिन पर इस दास्तान की हिफ़ाज़त को लाज़िमि क़रार दिया।
(9)
मिर्ज़ा
अब्दुल्लाह इस्फ़हानी (आफ़न्दी ) ने इस को रियाज़ुल उलमा में नक़्ल फ़रमाया।
(10)
मिर्ज़ा
नूरी ने इस को जन्नतुल मावा और नजमुस साक़िब में दर्ज किया है।
इनके अलावा भी दूसरे बहुत से शिया अफ़राद ने
इसको अपनी अपनी किताबों में लिखा है और इस को मुस्तनद क़रार दिया है।
हमने ऊपर की लाईनों में जो कुछ लिखा है उसका
नतीजा यह है किः
(1)
क़वाएदे
कुल्ली का तक़ाज़ा यह है कि दूसरे मासूम इमामों की तरह हज़रत महदी अलैहिस्सलाम ने
भी सुन्नते रसूल पर अमल करते हुए शादी की हो और साहिबे हमसर व फ़रज़न्द हुए हों।
(2)
बहुत सी
रिवायतों में हज़रत वली ए अस्र की औलाद के सिलसिले में बहस मौजूद है।
(3)
मासूमीन
अलैहिस्सलाम की बहुत सी दुआओं में हज़रत वली ए अस्र के फ़रज़न्दों और अहले बैत पर
दुरुद भेजी गई है।
(4)
दास्ताने
अली इब्ने फ़ाज़िल हर एतेबार से क़ाबिले ऐतेमाद व इस्तेनाद है। क्योंकि मौसूफ़
दानिशमन्द परहेज़गार और यगाना ए रोज़गार थे और फ़ज़्ल इब्ने याहिया जिन्होंने इस
दास्तान को नक़्ल किया है ख़ुद भी हर जेहत से मौरिदे ऐतेमाद हैं।
(5)
अली इब्ने
फ़ाज़िल की बयान करदह दास्तान को बुनियाद क़रार देते हुए यह नतीजा निकलता है कि
हज़रत महदी अलैहिस्सलाम की औलाद एक जज़ीरह बनामे जज़ीरह ए ख़ज़रः में जो बहरे एटलस
में वाक़े है, अपनी ज़िन्दगी बसर करती है और हर साल वह मेहरे ताबां यानी हज़रत
हुज्जत हज के मौसम में तशरीफ़ लाते हैं। वह अपने आबा व अजदाद की ज़ियारत हिजाज़ व
इराक़ व तूस (ईरान) में करते हुए उसी जज़ीरे में वापस तशरीफ़ ले जाते हैं। ज़्यादा
तर आप का क़ियाम उसी जज़ीरे में रहता है।
यहाँ फ़ितरी तौर से यह सवाल पैदा होता है कि अगर बहरे एटलस में कोई ऐसा
जज़ीरा मौजूद है तो दरिया नवरदों और फ़िज़ा नवरदों (दरिया और हवा में सैर करने
वाले) की तरफ़ से इसका इन्केशाफ़ क्यों नही हुआ ? ख़ुसूसन उन हवाई
ज़हाज़ों की ईजाद के बाद जो महदूद चन्द घन्टों में कुर – ए- ज़मीन के गिर्द चक्कर लगा लेते हैं। यह बात कैसे
मुम्किन है कि ऐसी सर ज़मीन हवाई जहाज़ों की दूर बीन और फ़िज़ाई किश्तियों की
तहक़ीक़ से पोशीदा रहे जो अतराफ़े ज़मीन में मसरुफ़े परवाज़ रहती हैं।
इस सवाल का जवाब यह है किः
अगर ख़ुदा वन्दे आलम चाहे तो अपनी हुज्जत को दुशमनों की निगाहों से हमेशा
पोशीदः व महफ़ूज़ रख सकता है और वह यह भी कर सकता है कि अपनी हुज्जत को पूरे जाह व
हशम और उनके ख़ानदान को मअ अहलो अयाल मुकम्मल तौर से पोशीदा रखे। उसकी क़ुदरत के
मुक़ाबले छोटा, बड़ा, कमसिन, बुज़ुर्ग, हलका व भारी कोई फ़र्क़ नही करता। जैसे कि
अमीरुल मोमनीन अलैहिस्सलाम का इरशाद है--
मिर्ज़ा नूरी ने हूज़ूरे अकरम (स.) के बहुत से मोजज़े दुशमनों की निगाहों
से आप के पोशीदा होने के बारे में तहरीर किये हैं जैसा कि क़ुरआने मजीद भी इस बारे
में इरशाद फ़रमाता है कि ..
जब तू क़ुरआन की तिलावत करता है, तो हम तेरे और उन अफ़राद के दरमियान जो
रोज़े क़ियामत पर ईमान नही रखते एक पोशीदा पर्दा क़रार देते हैं। सीरत व तारीख़ की
किताबों में नक़्ल हुआ है कि अबु सुफ़यान, नज़्र बिन हारिस, अबु जहल और उम्मे जमील
(अबु लहब की बीवी) सैकडों मर्तबा हज़रत को अज़ीयत पहुँचाने के इरादे से आपके पास
आये, लेकिन हज़रत को न देख सके। तो फ़िर कौन से ताअज्जुब है कि बात हो कि ऐसे बहुत
से अज़ीम शहर दरिया और सहराओं में मौजूद हों जिन को ख़ुदा ने दुनिया वालों की नज़र
से पोशीदा रखा हो और जब लोग वहाँ से गुज़रते हों तो दरिया और सहरा के अलावा कुछ न
देखते हों।
मरहूम निहावन्दी ने हुज़ूरे अकरम (स.) के दुशमनों की निगाहों से पोशीदा
रहने के बारे में बहुत से मोजज़ात तहरीर करने के बाद लिखा है कि इसी तरह हज़रते
हुज्जत अलैहिस्सलाम का वजूदे मुबारक, लम्बी उम्र और ग़ैरों की निगाह से पोशीदा रहना
भी परवर दिगार की उन अजीबा आयातों में से है, जिन की तकज़ीब नही की जा सकती और अगर
कोई उसमें शक करता है तो फिर वह ईमाने कामिल नही रखता बल्कि ज़ईफ़ुल ईमान है।
हज़रत वली ए अस्र की ज़मान
– ए-
ग़ैबत की दुआओं में से एक दुआ यह भी है कि
बारे इलाहा ! मुझे दुश्मनों की
निगीहों से पोशीदः फ़रमा और मेरे और मेरे दोस्तों के दरमियान इज्तेमा हासिल फ़रमा।
चुँकि मशिय्यते इलाही यही थी कि उसकी हुज्जत दुश्मनों की नज़र से पोशीदः
रहे और फिर ख़ुद इमाम की दुआ भी कि जिसका क़बूल होना लाज़मी है। इसलिए जब तक ख़ुदा
चाहेगा आप निहायत जाह व हशम के साथ मअ हमसर व फ़रज़न्दान दुशमनों के शर से महफ़ूज़
और उनकी निगाहों से पोशीदः रहेंगे। इनशाअल्लाह !
कुछ लोगों का कहना है कि इस ज़माने में बल्कि अब से बहुत पहले ज़मीन की एक
- एक गज़ और एक - एक बालिश्त तहक़ीक़ की जा चुकी है। इंसानों ने उसके तमाम गोशे और
ज़ाविये छान मारे हैं, लेकिन उसके बावजूद किसी ने ऐसी जगह नही पाई और न ही उस किस्म
के जज़ीरे और शहर देखे। अगर उनका वजूद होता तो लाज़ेमन देखे जाते और इस्लाम के अहम
तरीन मराकिज़ में उनका शुमार होता। इस बिना पर क़तई तौर से यही कहा जा सकता है कि
ऐसे मक़ामात का कहीँ कोई वजूद नही है।
इन सवालों का मुख़्तसर जवाब हम यही देंगे कि मग़रिबी तहक़ीक़ करने वालों ने
ख़ुद इस बात का एतेराफ़ किया है कि अभी ज़मीन के बहुत से हिस्से ना शनाख़्ता हैं और
बहुत से मक़ामात तहक़ीक़ के मोहताज हैं। मुम्किन है कि हम किताब के आख़िर इस बारे
में और ज़्यादा हवाले नक़्ल करें। ऐसी सूरत में किसी को यह हक़ नही पहुँचता कि ऐसे
जज़ीरों का क़तई तौर पर मुन्किर हो जाये। इस लिए कि उनका, उन तक न पहुँचना, उनके न
होने की दलील नही बन सकता। मशहूर कुल्लिया है कि-- किसी चीज़ का न पाना, उसके न
होने की दलील नही है।
गुज़िश्ता उलमा ने ऐसे हज़रात के जवाब में और उनकी रद्द में लिखा है कि
पहले आप यह बताइये कि सद्दे सिकन्दरी, ग़ारे असहाबे कहफ़, जाबलसा और जाबलक़ा,
मदीनतुन नोहास और उन्हीँ के मिस्ल और बहुत से मक़ामात कहां हैं ? इनका तज़केरा अक्सर जगह मौजूद है मगर सही जाए वक़ूअ का
किसी को इल्म नही है। लिहाज़ा हमारे लिए तो उनके शुबहेजात बिल्कुल ना क़ाबिले
तवज्जोह हैं। क्योँकि हमारे ज़माने में मुसल्लसे बरमूदा की मिसाल बतौरे नमूना मौजूद
है। जो बहरे एटलस के वसीअ (व्यापक) इलाक़े में तशकील दी जाती है। जब कि अभी तक किसी
ने भी समुन्द्र की पैमाइश व तहक़ीक़ नही फ़रमाई है और आज तक मुसल्लसे बरमूदा के वसत
तक कोई नही पहुँचा है। बल्कि अब तक कोई हवाई जहाज़ भी उसके ऊपर से परवाज़ नही कर
सका है। मज़े की बात तो यह है कि इस मुसल्लस के दरमियान आबे सफ़ेद मौजूद है जो अली
इब्ने फ़ाज़िल के ब्यान से कतअन मुताबेक़त रखता है। आज तक कोई बड़े से बड़े जहाज़
उस पानी के नज़दीक नही पहुँचता है। क्योँकि जो भी उस तरफ़ जाता है, उसको वह पानी
अपनी तरफ़ ख़ैंच कर ग़र्क़ कर देता है। जो हवाई जहाज़ उस सफ़ेद पानी पर परवाज़ की
कोशिश करता है वह हादसे का शिकार हो कर ग़ायब हो जाता है और अपने वजूद का कोई निशान
नही छोड़ता। यहाँ के ह़ादसों में अभी तक सैकड़ों किश्तियाँ और जहाज़ और हवाई जहाज़
लुक़मए अजल बन चुके हैं, जिन का आज तक कोई सुराग़ नही मिल सका है। इन हादसों से
हमें अली इब्ने फ़ाज़िल के अल्फ़ाज़ याद आते हैं जो उन्होंने उस जज़ीरे की किश्ती
के मल्लाह से नक़्ल किये हैं। उन्हों ने फ़रमाया था कि----
दुशमनों के जहाज़ और कश्तियाँ जब इस सफ़ेद पानी में दाख़िल होते हैं तो
ख़्वाह कितने ही मुस्तहकम क्योँ न हों, मगर हमारे मौला (हज़रत साहेबुज़ ज़मान) की
बरकत से ग़र्क़ हो जाते हैं। यही वह ब्यान है जो मुसल्लस बरमूदा तक जाने वाले हवाई
जहाज़ के पाईलटों और जहाज़ के चलाने वालों और किश्ती के मल्लाहों के ज़रिए हम तक
पहुँचे हैं।
मुसल्लसे बरमूदा
मुसल्लसे बरमूदा वह मक़ाम है जहाँ दुनिया के हैरत अन्गेज़ हादसे रुनुमा
होते हैं। बहरे एटलस के इन्तेहाई मग़रिब में वाक़े, मुसल्लसे बरमूदा के हालात ने
दुनिया के तहक़ीक़ व जुस्तुजू करने वाले सैंकड़ो अफ़राद की तवज्जोह को अपनी जानिब
जज़्ब किया है। लोगों ने इन्तेहाई तलाश व कोशिश के बाद यहाँ के सर बस्ता राज़ों को
मुन्कशिफ़ करने की कोशिश की है, मगर अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि उन्होंने इस
मैदान में जिस क़दर तग व दो फ़रमाई, उसी क़दर नाकामी का मुँह देखना पड़ा। दुनिया
अभी तक कोई क़ाबिले एतेमाद राय पेश नही कर सकी है।
चार्ल ...... जिन की तहक़ीक़ दूसरों के मुक़ाबिल ज़्यादा क़ाबिले तवज्जोह
क़रार दी गयी है, वह लिखते है कि --
इसके बावजूद कि इंसान ने फ़ज़ा के बहुत से इबहामात को तसख़ीर कर लिया है और
दुनिया की बहुत सी चीज़ों पर कन्ट्रोल हासिल कर के गेती के राज़ों को मुन्कशिफ़ कर
लिया है, मगर फ़िर भी ज़मीन के 3/5 दरियाओं के अजाएबात और चाँद की बहुत सी आतिश
फ़िशानियों से ना वाक़िफ़ है। मुसल्लसे बरमूदः का जाए वक़ूअ ( लोकेशन
)
मुसल्लसे बरमूदा के पश्चिम में बहरे एटलस, पूरब में फलोरिडा, उत्तर में
जज़ाइर और दक्षिण में जज़ाइरे बरमूदा हैं। इस मुसल्लस का सर बरमूदा, मियामी और सन
ख़्वां कहलाया जाता है। यह मुसल्लस, जिस का सर बरमूदा है, मुसल्लसे बरमूदा के नाम
से शोहरत पा गया है। इस जगह को इस नाम से सब से पहले जनाब विनेन्ट गादिस मोअल्लिफ़े
किताबे (ऊफ़ुक़े ना मरई) ने मोसूम किया था। बाद में यह इसी नाम से मशहूर हो गया।
जज़ाइरे बरमूदा बहरे एटलस के दक्षिणी पश्चिम में 360 छोटे छोटे
जज़ीरे मौजूद हैं। जिन सब को मिला कर जज़ीर ए बरमूदः कहा जाता है। यह जज़ीरे जिन का
पाये तख़्त हमिल्टन है समुन्द्र की बहिश्त कहे जाते हैं। क्यँकि इन जज़ाइर के
मनाज़िर निहायत दिलफ़रेब व फ़रह बख़्श हैं इन जज़ाएर के मजमूऐ में बड़े जज़ीरे
बरमूदह, सेन्ट जार्ज, सेन्ट डेविड, गोमर सोमर्ट और ...... हैं। यहाँ 20 जज़ीरे ऐसे
हैं जिनमें आबादी है और वहाँ तक़रीबन 60000 अफ़राद आबाद हैं। अगरचे यह जज़ीरे हरम
सैर हैं, लेकिन बेहतरीन आब व हवा रखते हैं। उस वक़्त जब कि न्युयार्क में सरदी का
मौसम होता है तब बरमूदः की सतहे ज़मीन फूलों से छुप जाती है। मौसमे सरमा में बरमूदा
से सब्ज़ियां और फूल अमरीका को बरामद किये जाते हैं। इन जज़ीरों का पता 1519
में एक इस्पानवी ख़्वान दो बरमूदर ने लगाया था। 1609 में जब जार्ज सूमर्स की किश्ती
उस इलाक़े में डूब गयी, तो इस वास्ते से उन जज़ीरों का तअल्लुक़ इंग्लैंड से हो
गया।
जज़ीर ए बरमूदः तक़रीबन 33 दर्जा उत्तरी चौड़ाई में और 64 दर्जा पश्चिमी
लम्बाई में वाक़े है और इस तरह यहाँ इन सिरों से एक मूसल्लस बन जाती है जिस को
मुसल्लसे बरमूदह कहते हैं।
फ़लोरिडा व पोरट्रेको अमरीका के मशहूर शहर इस मुसल्लस के नज़दीक वाक़े हैं
और दरिया ए सारगासू का अहम तरीन दरिया है जो इस इलाक़े को समुन्द्र से अलग करता है।
मोहीब पहाड़ दरिया के नीचे समुन्द्र में हुए बहुत से हादसे और नाक़ाबिले तौजीह
वाक़ेआत जो मुसल्लसे बरमूदह से मुतअल्लिक़ हैं, वह दरिया ए सारगासू के इलाक़े में
ही रूनुमा हुए हैं।
दुनिया के इस इलाक़े के बहुत से पोशीदा राज़ जो ज़माना ए क़दीम से होते चले
आए हैं मौजूदः दौर की तारीख़ से मिल गये हैं। क्योँकि इस इलाक़े का सबसे पहला
हादसा जो तारीख़ में सब्त हुआ है वह सर क्रिसतेफ़ ....... का है ........ ने आख़िरे
सितम्बर 1492 में नई दुनिया मालूम करने के लिए सफ़र अख़्तियार किया, तो वह दरिया ए
सारगासू के मग़रिब में किश्ती के क़ुतुब नुमा के ख़राब हो जाने की तरफ़ मुतवज्जेह
हुआ। चुनानचे मक़नातीसी बिजली से पैदा होने वाला यह इख़्तेलाल 5 क़र्न गुज़रने के
बावजूद आज भी मुस्तक़िल्लन इस इलाक़े के दरिया व हवा में उसी तरह मौजूद है और आज भी
उस की हुक्मरानी उसी तरह है।
इन 5 सदियों यानी 500 सालों में इस इलाक़े में होने वाले हादसों व अजाएबात
का सिलसिला कभी नही टूटा। बल्कि उन में इज़ाफ़ा ही होता चला गया और आहिस्ता आहिस्ता
उनकी शोहरत पूरी दुनिया में फैल गई। बिजली व धुएं की किश्तियाँ ईजाद हुईं नये नये
डिज़ाईन के जहाज़ वजूद में आये, मगर समुन्द्र के इस मुसल्लस के सफेद पानी में हर
रोज़ किश्ती व जहाज़ों के डूबने की ताज़ा ताज़ा इत्तेलाआत सुनने को मिलती रहीं।
इब्तेदा में कश्तियों के डूबने की इत्तेला बिल्कुल अजीब व नाक़ाबिले यक़ीन होती थी
मगर आहिस्ता आहिस्ता वाक़ेआत की कसरत ने यक़ीन करने पर मजबूर कर दिया।
इन हादसों की हर रोज़ बढ़ती तादाद ने रियासते मुत्तहेदा अमरीका को नये नये
इक़दामात करने के लिए मुतवज्जेह किया। चुनान्चे हुकूमत ने 5 जंगी जहाज़ों ( TBM ) पर मुश्तमिल एक पार्टी तशकील दी जिसने 5
दिसम्बर 1945 को जंगी एयर पोर्ट ( फ़ोर्ट ..... ) से 5 बेहतरीन पाईलटों और 9
मुहक़्क़ेक़ीन के साथ वहाँ के हालात की तहक़ीक़ के लिए सफ़र किया। मगर वह तमाम एक
गिरोह की शक्ल में ग़ायब हो गये। उनकी मालूमात के लिए उस वक़्त के निहायत मज़बूत व
मुस्तह़कम मार्टिन माईनर, हवाई जहाज़ को रवाना किया गया। मगर वह भी उसी मुसीबत से
दोचार हो गया।
मुसल्लसे बरमूदा के हादसों ने दूर दराज़ के इलाक़ों के लोगों की तवज्जोह को
अपनी तरफ़ मबज़ूल (आकर्षित) कर लिया। क्योंकि जो हवाई जहाज़ उस सफ़ेद पानी पर से
उड़ान भरता वह मज़कूरह तरीक़े से ग़ायब हो जाता और जो हवाई जहाज़ ग़ायब हुए जहाज़
की जुस्तुजू में जाता वह भी वैसे ही हादसे का शिकार हो जाता। आख़िर कार हुकूमत ने
तमाम वाक़ेआत का एतेराफ़ किया और ग़ौर व फ़िक्र करने वाले अफ़राद को दुनिया के
मुख़्तलिफ़ हिस्सों से बुला कर सीमीनार व कान्फ़्रेन्स कीं। हुकूमत की तरफ़ से
सैकड़ों दानिशमनदों को बहुत से इम्कानात व अख़तियारात दिये गये। जिन लोगों ने इस
बारे में तहक़ीक़ व जुस्तुजू की हम उनकी तहक़ीक़ का मुख़्तसर ख़ुलासा नक़्ल कर रहे
हैं।