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ग़ैबते कुबरा में इमाम महदी अलैहिस्सलाम का मरकज़ी मुक़ाम

इमाम महदी अलैहिस्सलाम चूँकि उसी तरह जिन्दा और बाक़ी हैं जिस तरह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम, हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम, हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम, हज़रत इलियास जिन्दा और बाक़ी है। उन सब का मरकज़ी मक़ाम मौजूद है। जहाँ यह रहते हैं मसलन हज़रत ईसा चौथे आसमान पर (क़ुरआन मजीद) हज़रत इदरीस जन्नत में (क़ुरआन मजीद) हज़रत ख़िज़्र और इलयास, मजमा उल बहरैन यानी दरया – ए- फ़ारस व रूम के दरमियान पानी के क़सर में।

(अजाएब अलक़स अल्लामा अब्दुल वाहिद सफ़ा 176)

दज्जाल व बताल तबरिस्तान जज़ीर-ए- मग़रिब में।

 (किताब ग़ायतुल मक़सूद जिल्द 1 सफ़ा 102)

याजूज माजूज बहरे रोम के अक़ब में  दो पहड़ों के दरमियान।

 (ग़ायतुल मक़सूद जिल्द 2 सफ़ा 74)

 इब्लीस लईन, इस्तेमारे आरज़ी के वक़्त वाले पाये तख़्त मुल्तान में।

(किताब इरशाद उत तालेबीन अल्लामा आख़ून्द दरवीज़ा सफ़ा 243)

तो लामुहाला हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का भी कोई मरकज़ी मक़ाम होना ज़रूरी है। जहाँ आप तशरीफ़ फ़रमा हों और वहाँ से सारी कायनात में अपने फ़राइज़ अन्जाम देते हों। इसी लिए कहा जाता है कि ज़मान -ए- ग़ैबत में हज़रत महदी अलैहिस्सलाम (जज़ीरए ख़िज़रा और बहरे अबयज़) में अपनी औलाद और असहाब समेत क़याम फ़रमा हैं और वहीं से बा एजाज़ तमाम काम किया करते हैं और हर जगह पहुँचते है। यह जज़ीर – ए- ख़िज़रा, सरज़मीने विलायत बरबर में दरमियान दरिमया – ए- इन्लिस वाक़े है। यह जज़ीरह मामूर व आबाद है। इस दरिया के साहिल पर एक मौज़ा भी है, जो बशक्ले जज़ीरा है। उसे इन्लिस वाले (जज़ीर – ए- रफ़ज़ा) कहते हैं, क्योंकि उसमें सारी आबादी शियों की है। इस तमाम आबादी की ख़ुराक वग़ैरा जज़ीर – ए- ख़िज़रा से बहरे अबयज़ के रास्ते साल में दो बार इरसाल की जाती है।

(तारीख़ जहाँ आरा, रियाज़ उल उलमा किफ़ायतुल महदी, कशफ़ुल किफ़न, रियाज़ उल मोमेनीन, ग़ायतुल मक़सूद, रिसाला जज़ीर – ए- ख़िज़रा, बहरे अबयज़ और मजालिस उल मोमेनीन, अल्लामा नूर उल्ला शुस्तरी व बेहार उल अनवार, अल्लामा मजलिसी किताब रौज़तुश शोहदा अल्लामा हुसैन वाज़े क़ाशफ़ी सफ़ा 438)

इन किताबों में इमाम महदी अलैहिस्सलाम के अक़सा – ए- बिलादे मग़रिब में होने और उनके शहरों पर तसर्रुफ़ रखने और साहिबे औलाद वग़ैरा होने का हवाला है।

इमाम शिबलंजी अल्लामा अब्दुल अल मोमिन ने भी अपनी किताब नूर उल अबसार के सफ़ा 152 पर इसकी तरफ़ किताब जामे  उल फ़नून कहवाले से इशारा किया है। ग़यास अल ग़ास के सफ़ा 72 पर है कि यह वह दरिया है जिसके जानिबे मशरिक़ चीन, जानिबे ग़रबी यमन, जानिबे शुमाली हिन्द, जानिबे जुनूबी दरिया -ए- मोहित वाक़े हैं। इस बहरे अबयज़ व अख़ज़र का तूल 2 हज़ार फ़रसख़ और अर्ज़ पाँच सौ फ़रसख़ है। इसमें बहुत से जज़ीरे आबाद हैं जिनमें एक सरान्दीब भी है इस किताब के सफ़ा 295 में है कि “ साहिबुज़्ज़मान ” हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का लक़ब है। अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि आप जिस मकान में रहते हैं उसे “ बैतुल हम्द ” कहते हैं।

 (सफ़ा अल वरा सफ़ा 263)

जज़ीर – ए- ख़िज़रा में इमाम अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम की क़याम गाह जज़ीर – ए- ख़िज़रा में जो लोग पहुँचे हैं उनमें से शेख़ सालेह, शेख़ ज़ैनुल आबेदीन अली बिन फ़ाज़िल माज़िन्दरानी का नाम नुमाया तौर पर नज़र आता हैं। आपकी मुलाक़ात की तसदीक़ फ़ज़ल बिन यहिया बिन अली ताबई कूफ़ी व शेख़ आलिम आमिल शेख़ शम्सुद्दीन नजी व शेख़ जलालुद्दीन, अब्दुल्लाह इब्ने अवाम हिल्ली ने फ़रमाई है।

अल्लामा मजलिसी ने आपके सफ़र की सारी रूदाद एक रिसाले की सूरत में ज़ब्त की है। जिसका मुसलसल ज़िक्र बेहार उल अनवार में मौजूद है। रिसाला जज़ीर ए ख़िज़रा के सफ़ा 1 पर है कि शेख़ अजल सईद शहीद बिन मुहम्मद मक्की और मीर शमसुद्दीन मुहम्मद असद उल्लाह शूसतरी ने भी तसदीक़ की है।

मोल्लिफ़ किताबे हाज़ा कहता है कि हज़रत की विलादत हज़रत की ग़ैबत हज़रत का ज़हूर वग़ैरा जिस तरह रमज़े ख़ुदावन्दी और राज़े इलाही है उसी तरह आपकी जाए क़याम भी एक राज़ है। जिसकी अत्तेला ए आम ज़रुरी नही है। वाज़े हो कि कोलम्बस के इदराक से भी पहले अमरीका का वजूद था।